Saturday, September 13, 2008

बरसात का मौसम लिखने का मौसम

आदि कल से जितने कवि शायर ,गीतकार हुए सभी ने ग्रीष्म और शीत ऋतू पर कम वर्षा ऋतू पर कुछ ज़्यादा ही लिखा है /किसी ने बदल डरावने बताये ,किसी ने उन्हें जुल्फें बताया , किसी ने हरियाली पर ,रिमझिम फुआरों पर मोर पपीहे पर सब पर लिखा /
सम्ब्हब है यह मौसम उन्हें रास आया हो , यह भी सम्ब्हब है उनके पास छाता रहता हो या पड़ोसी से उधार मिल जाता हो /यह भी हो सकता है की उनके बच्चे कापी किताब ,एडमीशन फीस आदि को परेशान नहीं करते होंगे या उनकी पत्नियों की ओर से आचार के लिए कैरी और सरसों के तेल की फरमाइश न की जाती होगी - हो सकता है वे कमरे से निकल बाथरूम तक प्लास्टिक या बोरी ओढ़ कर चले जाते होंगे /हो सकता है उनके मकान में सीलन न रहती हो और यह भी सम्भव है की कमरा उनका इतना बड़ा हो कि कि उसमें डोरी बाँध कर कपडे सुखा सकते होंगे और मकान मालिक डोरी बाँधने कील ठोक लेने देता होगा /यह भी सम्भव है कि उनके चड्डी बनियान सुखाने के लिए उनके घर में बिजली कि प्रेस रहती होगी /
किंतु यह तो सत्य है ही कि लिखने का मौसम तो बरसात का ही होता है / क्योंकि इन्ही दिनों कीडे पतंगे रोशनी के चारों ओर ऐसे चक्कर लगाते हैं जैसे किसी दफ्तर में एकाध पोस्ट निकलने पर शिक्षित बेरोजगार अपने अपने प्रमाण पत्रों का बण्डल लिए हुए चक्कर लगाने लगते हैं /उन बंडलों में मूल निवासी का प्रमाण पत्र भी होता है वह कैसे मिलता है लेने वाला जनता है वैसे देने वाला भी क्या पता जनता होगा या नहीं ,पता नही, क्योंकि वहां तो इकट्ठे दस्तखतों के लिए कागज जाते है -किसने क्या किया उसे कहाँ पता चल पाता है =है दुष्यंत कुमारजी को पता चल गया था तो उनहोंने कह दिया कि ""यहाँ तक आते आते सूख जाती है सभी नदियाँ ,हमें मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा ""/बरसात के मौसम में जगह जगह पानी गड्ढों में ऐसे एकत्रित हो जाता है जैसे साहित्यकार कर्मचारी के टेबल पर फाइलें जमा हो जाती हैं/ बिजली ऐसे चमक जाती है जैसे किसी शोकसभा में नेताजी मुस्करा रहे हों , बदल ऐसे गरजने लगते है जैसे कोई क्रोधी व्यक्ति पूजा पाठ कर रहा हो / कभी कभी पानी बॉस के गुस्से की तरह बडी बडी बूंदों से गिरता है /धूप के दरसन दुर्लभ हो जाते है जैसे वार्ड मेम्बर के वार्ड में और चिकित्सक के अस्पताल में / कपडे सुखाने लोग ऐसे तरस जाते है जैसे कर्मचारी महगाई भत्ते को / मक्खी मच्छर जनसँख्या की मानिंद बड़ते चले जाते है और छितराए बदल इधर उधर ऐसे भाग ने लगते है जैसे जुए के अड्डे पर पुलिस की रेड पडी हो/
इस मौसम में बरसात की बूंदों के साथ आदमी वैसे ही नाचने लगता है जैसे पड़ोसी का बच्चा फ़ैल हो जाए ,लडकी कहीं चली जाए या मियां बीबी में झगडा होजाए ,देख कर पड़ोसी नाचता है / पक्षियों के साथ वह ऐसे गाने -गुनगुनाने लगता है जैसे शोर पोलुशन के प्रभाव को न जानने वाले किंतु शिक्षित लोग मोहल्ले में माइक लगा कर रात भर कीर्तन करते है / बादलों के साथ वह ऐसे उड़ने लगता है जैसे चुनाव जीत कर लोग हवाई जहाज़ में उड़ते हैं /मोरों के साथ वह ऐसे झूमने लगता है जैसे अपराधी लोग उनके बॉस के वरी होने पर शेम्पेन खोल कर झूमते हैं/
कभी कभी बदल इतने नीचे आजाते है जैसे एयर कंडीशन कार से उतर कर कोई मोहल्ले मोहल्ले वोट मांग रहा हो /बादलों के कारण निस्तेज तारे -बादलों को हटाने हेतु हवा से गटबंधन करते है ताकि हवा बादलों को उड़ा लेजाये और फिर वे अपनी छवि जनता को दिखा सकें और डरते भी है कि कहीं ऐसा न हो जाए कि बदल और हवा का ही कहीं गठबंधन न हो जाए /
जैसे कारण ,कर्ता और कर्म इन तीनो चीजों से ही कर्म पूर्ण माना जाता है वैसे ही एडमीशन फीस .कापी किताबों और छाता रेन कोट से मानसून सत्र पूर्ण होता है /जैसे ज्ञान ज्ञेय और परिजाता से कर्म की प्रेरणा होती है वैसे ही फीस किताबें छाता आदि से प्रोविडेंट फंड से एडवांस लेने की प्रेरणा होती है / कोई अपने बच्चे का मुंडन , तो कोई कर्णछेदन कराता है तो कोई अपनी पत्नी को ही बीमार कर देता है / वे कह रहे थे कि पत्नी का वास्तविक उपयोग यही है कि कर्मचारी वक्तन फ वक्तन पत्नी को बीमार करता रहे और प्रोविडेंट फंड से कभी टेम्परेरी ,कभी पार्ट फाईनल निकलता रहे /
इस मौसम में सबसे बड़ी परेशानी का सवव होता है छाता /क्योंकि भीगते तो छाता में भी है मगर शराफत से / अब आप बताइये जब छाता एक आदमी को भी नहीं बचा पाता बरसात से, तो ऐसे में यह गाने की क्या जरूरत है कि ""मेरी छतरी के नीचे आजा क्यों भीगे .......खड़ी खड़ी /एक तो दिक्कत यह है कि छाते खोते बहुत है /दफ्तर ले गए ,खोला ,सूखने रख दिया ,शाम को पानी बंद हो गया भूल आए /असल में कर्मचारी साडे पाँच बजते ही ऐसे भागते है कि दस मिनट भी रुक गए तो अनर्थ हो जाएगा / अगर बॉस छुट्टी पर हो तो पाँच बजने का भी क्या मतलब / दूसरे दिन तलाशेंगे -फिर मिलता है क्या / एक दिन वे छाते पर अपना नाम लिखवा रहे थे = बोले खोयेगा नहीं /मैंने कहा जब कोई तेरा छाता उठा कर ले जाएगा तो तेरा नाम,चिल्लाएगा क्या कि यह मुझे ले जा रहा है /मगर नहीं माने नाम लिखवा ही लिया /
सच है बरसात किसी के लिए मुसीवत है ,किसी के लिए मसर्रत है ,किसी के लिए हकीकत है तो कवियों और लेखकों को प्रेरणा प्रदान करने वाली है

कवि गोष्ठी

ऐसा लगता है कि कवि गोष्ठीयों में दिलचस्पी रखने वाला साहित्य प्रेमी आज वंचित हो गया है या यह भी कह सकते हैं कि वंचित कर दिया गया है /महत्त्व पूर्ण कवि साथी लगातार ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं क्यों कि कवि अपनी बात कहना चाहता है वोह उत्सुक है अपनी सुनाने को अपनी छपाने को साथ ही उसकी यह शिकायत कि उसकी रूचि अनुकूल श्रोता नहीं मिल पाते हैं /कवियों के पास विपुल सामग्री है नगर में साहित्यकारों की कमी नहीं फिर भी कवि गोष्ठियों में श्रोता दिखाई नहीं देते /अब या तो वे आते नहीं या बुलाए जाते नहीं "हमसे आया न गया तुमसे बुलाया न गया "

मानवीय मनोब्रत्ति कि सच्चाई छूकर साहित्य सृजन कर कवि उसे अभिव्यक्त करना चाहे और उसे उपयुक्त पात्र न मिले या मिलने पर उसके सराहना न करे तो साहित्यकार को म्रत्यु तुल्य पीड़ा ( वह जैसी भी होती हो ) होना स्वाभाविक है -यही पीड़ा सम्पादकीय अनुकूलता न मिलने पर भी होती है तो ऐसे कवियों या लेखकों को यह कहने पर विवश होना पढता है कि हम तो ""स्वांत सुखाय " लिख रहे हैं /मैं भी पहले लेख लिख कर भेजता था और खेद सहित वापस आजाता था तो उसे स्वांत सुखाय के पेड़ में बाँध दिया करता था /१५ साल पुराने स्वांत सुखाय वाले लेख जब आज पढता हूँ तो लगता है कि सम्पादक सही थे वे लेख पाठक दुखाय ही थे / कमोवेश हर कवि कि इच्छा होती है कि वह अपने यहाँ गोष्ठी आयोजित करे मगर या तो वह किराये के मकान में रहता है या पुराने पुश्तैनी मकान में - जिनमें बड़े हाल का अभाव रहता है = हालाँकि वोह चाय पानी फूल माला सब की व्यवस्था अपनी आर्थिक तंगी के वावजूद करना चाहता है मगर उसके बच्चे बच्चियां इसे व्यर्थ का हुल्लड़ कहकर उसकी इच्छा को दवा देते हैं/
पत्नियाँ तो खैर पतियों से नाराज़ रहती ही हैं क्योंकि वे गोष्ठियों से देर रात घर लौट ते हैं /पत्नी आर्थिक 'मानसिक 'शारीरिक सब कष्ट वर्दाश्त कर सकती है -किंतु पती का देर रात लौटना उसकी वर्दाश्त से बाहर है क्योंकि उधर कवि ज्ञान बघारते रहते है और इधर ये सब्जी बघारती रहती है /
अब कवि को गोष्ठी में बुलाया है और वह दोराहे पर खड़ा है " मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं " और कविता का नशा उसे गोष्ठी की ओर खींच ले जाता है / आयोजक समय देता है ८ बजे कवि एकत्रित होते हैं दस बजे तक / कुछ कवि तो इतनी देर से पहुँचते हैं के तब तक आधे से ज़्यादा कवि पढ़ चुके होते हैं /इसमे एक फायदा भी है की उन्हें ज़्यादा देर इंतज़ार नहीं करना पड़ता और जाते ही सुनाने का नंबर लग जाता है /
गोष्ठियों में अब जो अपनी सुना चुके है बे वहाँ से खिसकने के मूड में होते है /सबसे सुगम रास्ता कान पर जनेऊ चढाया और उठ खड़े हुए गोया आते हैं अभी / कुछ लोग जनेऊ पहनते ही इसलिए हैं की वक्त वेवक्त काम आता रहे /अब जो बड़ी बड़ी डायरिया और बही खाते लेकर पहुँचते है उनको खिसकने में दिक्कत होती है अध्यक्ष बेचारा फंस जाता है भाग भी नही सकता और उसे सब से अंत में पढ़वाया जाता है जब तक चार -पाँच लोग ही रह जाते है / मैंने देखा है अखंड रामायण का पाठ -१२ बजे रात तक ढोलक मंजीरे हारमोनियम =दो बजे तक तीन चार लोग रह जाते है एक जो व्यक्ति तीन बजे फंस गया सो फंस गया सुनसान सब सो गए इधर इधर देखता रहता है और पढता रहता है काश कोई दिख जाए तो उससे पञ्च मिनट बैठने का कहकर खिसक जाऊँ -मगर कोई नहीं =न बीडी पी सकता है न तम्बाखू खा सकता है /तीन से पाँच का वक्त बडा कष्ट दाई होता है /सच है भगवान् जिससे प्रेम करते है उसी को कष्ट देते हैं इससे सिद्ध हो जाता है की तीन बजे से पाँच बजे तक पाठ करने वाले और गोष्ठियों के अध्यक्ष से ही भगवान् प्रेम करते हैं /
कवि की कविता पूर्ण होने पर दूसरे कवि तालियाँ बजाते है और बीच बीच में बाह बाह करते रहते है -आह कोई करताइच नई -क्योंकि उन्हें भी सुनना है /वास्तव में तालिया इस बात का द्योतक होती है कि प्रभु माइक छोड़ अपनी सिंहासन पर विराजमान होजाइये मगर जब वह वहीं बैठ कर डायरी के पन्ने पलट कर सुनाने हेतु और कविताये ढूढने लगता है तो शेष कवियों के दिल की धड़कन बढ़ जाती है चेहरे की रोनक विगड़ने लगती है / उधर कवि भी तो कहता है कि एक छोटी सी रचना सुनाता हूँ और फ़िर शुरू होजाता है -शेष कवियों कि भी कोई गलती नही वर्दाश्त कि भी हद होती है /क्योंकि कवि का जब तक नम्बर नही आता सुनाने का तब तक उसे गोष्ठी में बड़ा आनंद मिलता है और ज्यों ही उसने अपनी सुनाई उसे संसार नीरस प्रतीत होने लगता है बोर होने लगता है सोचता है माया मोह के बंधन सब झूंठे है वह स्थित प्रज्ञ सन्यासी की भांति निर्वाक और निस्पंद /
कुछ श्रोता है जो वाकई गोष्टी का आनंद लेना चाहते है उनको तो बेचारों को टीबी पता चलता है जब दूसरे दिन लोकल समाचार पत्र में छपता है कि किसने क्या कहा /पेपर में नहीं छापा तो गोष्ठी का मतलब ही क्या /सबसे पहले कवि उसमें अपना नाम देखता है इत्तेफाकन किसी कवि का नाम छूट जाए तो आयोजक और सचालक की खैर नहीं

Tuesday, July 15, 2008

सवाल पहले और बाद का

कहते हैं की माल पहले मिले और चोरी बाद में पकडी जाए तो समाचार पात्र में प्रकाशित योग्य समाचार बनता है =वास्तव में होना तो यह चाहिए कि चोरी कि रिपोर्ट के वाद इत्तेफाकन माल कि बरामदगी हो जाए तो मुख प्रष्ट पर प्रकाशित होने योग्य समाचार बनता है
माल का पकड़ा जाना अपने आप में एक महत्त्व पूर्ण घटना होतीहै =एक अधिकारी दौरे पर गए =उन्होंने तीन तहसील मुख्यालयों का मुआयना किया -दौरा करके लौटे तो पाया कि महगी रिस्टवाच कहीं फ्रेश होते समय रह गई =पी ऐ ने तीनों जगह फोन कर दिया -घड़ी की मेक हुलिया आदि बतला दिया =कहते है कि दूसरे दिन साहिब सुबह बाथरूम गए तो घड़ी बात रूम में मिल गई =कहते है कि तीनो जगह फोन लगाया गया कि घड़ी मिल गई है तलाश न की जाए =यह भी कहते हैं कि तीनों जगह से जवाब आया =यह आप क्या कह रहे है सर -घड़ी जप्त की जा चुकी है =मुलजिम कोगिरफ्तार किया जा चुका है और मुलजिम ने अपना इक्वालिया बयान देकर जुर्म कुबूल भी कर लिया है
ऐसी बहुत सी बातें हैं किपहले क्या होना चाहिए और बाद में क्या होना चाहिए और लगभग सभी बातें अनुत्तरित हैं -पहले मुलजिम को गिरफ्तार किया जाना चाहिए फिर माल बरामद करना चाहिए या पहले माल बरामद करना चाहिए =पंचनामा बना कर माल बरामद करना चाहिए या माल बरामद करके पंचनामा बनाना चाहिए =पहले शादी होना चाहिए फिर प्यार होना चाहिए या पहले प्यार होना चाहिए =पहले एन्कौन्टर होना चाहिए फिर अपराधी को गोली मरना चाहिए या पहले गोले मार देना चाहिए फिर एनकाउंटर दिखाया जन चाहिए =पहले क्षमा याचना करना चाहिए या पहले अभद्रता करके फिर मुआफी मांगना चाहिए =किसी को टक्कर मार कर पहले गाली देना चाहिए फिर क्षमा मांगना चाहिए या पहले सॉरी बोल देना चाहिए फिर गाली देना चाहिए =आजकल के लड़के करते हैं न -तेज़ गाड़ी चलाएंगे टकरायेंगे और सॉरी बोल देंगे यदि टक्कर खाने वाला कुछ फिर भी कहता है तो कहते है अबे साले सॉरी बोल तो दिया और क्या तेरे पैर पड़ने लगें -अब सीधी तरह से चला जा बरना ........
क्या हुआ कि किसी ने युद्दसिंह जी को गधा कह दिया -क़ानून के जानकर थे -दफा ५०० का अर्थ बखूबी समझते थे सो मान हानी का दावा कर दिया =हालाँकि ऐसे मुक़दमे बमुश्किल तमाम साबित होते है लेकिन युध्य सिंह जी रसूखदार इज्जत दार थे सो जुर्म सिद्ध हो गया नेक चलनी कि जमानत हो गई भविष्य में ऐसा न करने कि हिदायत मिल गई =अपराधी बोला हुज़ूर में कान पकड़ता हूँ अब कभी इन्हे गधा नहीं कहूंगा -मगर सरकार एक बात बता दीजिये कि किसी गधे को तो युध्यसिंह कह सकता हूँ -अदालत ने आई पी सी की दफा ४९९ का आद्योपांत अध्ययन करके कहा कि भाई इसमें तो ऐसा लिखा है कि किसी व्यक्ति को बोल कर -लिखकर -पढ़कर छाप कर अपमानित करेगा =और चूंकि गधा व्यक्ति नहीं है तो उसे आप जो चाहे कह सकते हैं =अदालत को धन्यबाद देकर जाते वक्त अपराधी ज़ोर से बोला ++नमस्ते युध्यसिंह जी
पहले बोलना चाहिए फिर सोचना चाहिए या पहले सोचना चाहिए फिर बोलना चाहिए क्योंकिअगर सोच कर बोला तो सुनने वाला एक किलोमीटर तक जा चुका होगातब बोलना शुरू होगा =कहते है कि पति नामक प्राणी सोच कर बोलता है और पत्नी बोल कर सोचती है =झगडा हुआ तो पति गुस्से में बोला -हे प्रभु =तेरी दुनिया में दिल लगता नही बापस बुलाले हे मालिक उठाले =पत्नी भी रोते हुए कहने लगी प्रभु मुझे भी उठाले -सुन कर पति बोला प्रभु ऐसी बात है तो में अपनी प्रार्थना बापस लेता हूँ और गाने लगा -जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ =खैर -शादी से पहले अपने सारे अफेयर्स बता देना चाहिए या शादी के बाद धीरे धीरे बतलाना चाहिए =पहले विरोध करना चाहिए फ़िर समझोते का अर्थ समझना चाहिए या पहले अर्थ समझना चाहिए फिर विरोध करना चाहिए = मुशायरे या कविसम्मेलन में पहले शेर समझना चाहिए फिर दाद देनी चाहिए या पहले दाद दे देना चाहिए फिर अर्थ समझना चाहिए -एक कवि सम्मलेन में कविकी दाढ़ में दर्द हो रहा था बेचारा परेशां था कि नाम पुकार लिया गया -माइक पकड़ते ही बेचारे ने कहा " आज मेरी दाढ़ में दर्द है " श्रोताओं में से आवाज़ आई "वाह वाह क्या बात है -क्या तसब्बुर है क्या जज्वात है साथ ही मुक़र्रर की आवाजें भी
पहले चूहों को गिन कर किसी अस्पताल में मौजूद चूहों कि संख्या बतलाना चाहिए या पहले संख्या बतला देना चाहिए फिर गिनती करना चाहिए और भी बहुत सी बातें हैं मसलन सब कुछ लुटा का होश में आना चाहिए या होश में आकर सब कुछ लुटा देना चाहिए =पुत्र कुपुत्र हो तो धन संचय करना चाहिए या धन संचय करके सुपुत्र को कुपुत्र बना देने में सहायक होना चाहिए / एक बात और कोई रचना लौटा कर लेखक के प्रति खेद व्यक्त कर देना चाहिए या उसे प्रकाशित करके पाठक के प्रति खेद प्रकट क्र देना चाहिए और यह भी कि किसी के जख्मों पर नमक छिड़क क्र हसना चाहिए या किसी के ज़ख्मों पर हंस हंस कर नमक छिड़कना चाहिए

Monday, July 14, 2008

kavi na houn nahi chatur kahavahun

कवि न होऊ नही चतुर कहाबहूँ

बात पुरानी किंतु सत्य -समाचार पत्रों से प्रमाणित सत्य -पनामा में एक कवि को इसलिए नौकरी से निकल दिया गया था क्योंकि वह कविताये करता था विश्वास न हो टू जनवरी से मार्च ९७ के समाचार पत्र उठा कर देखें -
अब कवि है तो कविताएँ तो करेगा ही- जिसप्रकार किसी जगह नियुक्ती हो जाने पर पुलिस वेरीफीकेशन बुलवाया जाता है उसी तरह पहले यह प्रमाणपत्र भी मगवाया जाना चाहिए की ये सज्जन कहीं कवि तो नहीं हैं या फिर आवेदक से शपथ पत्र लेना चाहिए की वह कवि नहीं है या दौरान सेवा वह कविताएँ नहीं लिखेगा -
कहते है कवि पैदा होता है बनता नहीं है वहीं यह भी कहा गया है की कब कौन कवि बन जाए कहा नहीं जा सकता - मौत -ग्राहक और कवित्व भाव का कोई भरोसा नहीं कब आजाये -तो ऐसी स्थिति में अव्वल तो कवि को नौकरी ही नहीं करना चाहिए और अगर नौकरी में रहते साहब की डाट फटकार -पत्नी की लताड़ -बच्चों की उद्दंडता -महगाई -तंगी -चिंता -तनाव -अशान्ती और बेचेनी गहन निराशा व दुःख इत्यादी से उसमें कवित्व भाव जाग्रत हो जाए तो उसे स्वयम ही तत्काल नौकरी छोड़ देना चाहिए और ==बडे बे आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले =से बच लेना चाहिए
शादी से पहले और नौकरी से पहले व्यक्ति वास्तव में कवि होता ही है वह चाँद -सितारे -बसंत -पुष्प -मोर -चातक -पपीहा सब पर लिखता है और सचोट लिखता है लेकिन शादी के बाद वह लिखता है आधा किलो आलू -सौ ग्राम मिर्च पर =एक किलो तेल पर -राशन की दुकान पर -चाँद सितारे उसके दिमाग में आते ही नहीं वह चाँद देखता है तो उसे रोटी दिखाई देती है -पूनम का चाँद यानी पूरी रोटी और अस्ट्मी का यानी आधी रोटी-
नौकरी तो कवि पुराने जमाने में भी करते थे और राज्य द्वारा उन्हें धन व सत्कार भी दिया जाता था भूषन आदि इसके प्रमाण हैं आम लोग भी कवियों को आमंत्रित करते थे और पारिश्रमिक कहो या कुछ भी कहो -विदाई के वक्त कुछ देते थे -यह इस बात से प्रमाणित होता है की =कवि को देन न चाहे विदाई पूछो केशव की कविताई =
वैसे भी आजकल नौकरी उन्ही की सही सलामत है जो यह सिद्धांत रखते है की =कवि न होऊ नहि चतुर कहावहूँ रुची अनुरूप साहब गुन गावहूँ= जो कवि नौकरी करते हैं वे अक्सर उदास ही रहते हैं कविता का मूड बनते ही बच्चे की फीस याद आने लगती है
मेरी बात सुनने में बडी अटपटी व बेहूदा लगेगी -मगर सत्य मानिए आज दुनिया में सबसे ज़्यादा कवि व शायर हैं मैं तो कवि गोष्टियों में देखता हूँ न -बहुत प्रचार प्रसार के बाद श्रोता तो कोई आते ही नहीं २५-३० कवि आते हैं हाथों में मोटी मोटी डायरियाँ लेकर रोकड़ वही खाता लेकर =अपना नम्बर आया रचना सुनाई वाह वाह सूनी अपना स्थान ग्रहण किया थोड़ी देर बैठे और खिसकने की जुगाड़ जमाने लगते हैं समापन के वक्त रह जाते है ७-८ कवि वो तो अच्छा है की आयोजक चाय नाश्ता सबसे आख़िर में रखता है - वाह वाह क्या बात है क्या तसब्बुर है क्या जज्बात है यह बोलना कवि गोष्ठी में जरूरी होता है तुम नही कहोगे तो तुम्हारी पर कौन कहेगा
पहले लेखक कम थे पाठक ज़्यादा आज लेखक ज़्यादा है पाठक मिलते ही नहीं -मुझे बचपन में किताबें ही नहीं मिली १४ साल का होते होते -किस्सा तोतामेना -सिंहासन बत्तीसी -बैताल पच्चीसी -चंद्रकांता संतति -भूतनाथ ही पढने को मिले जब शहर आया टीबी उपन्यास मिल पाये -आज किताबें है तो बच्चों को साहित्य में रूचि नहीं है
वैसे आचरण संहिता के मुताबिक कोई सेवक कविताएँ व लेख नहीं लिख सकता न प्रकाशित करवा सकता - वह किसी साहित्यिक समारोह दी अध्यक्षता नहि कर सकता =हाँ वह कार्यालय के समय में या समय उपरांत दारू पी सकता है -प्लाट खरीदने के नाम से फर्जी लोन प्राप्त कर सकता है -स्वस्थ पत्नी को बीमार बताकर उसके इलाज के पैसे ले सकता है किसी क्लब का सदस्य हो सकता है डांस बार में नाच गाने देख सकता है मगर कविताये न तो कर सकता है न छपवा कर कुछ पारिश्रमिक प्राप्त कर सकता है
समसामयिक मुद्दे पर संयत भाषा में साचोट कटु सत्य की अभिव्यक्ति कवि को नौकरी से हाथ धुल्वा सकती है- इसीलिए दुष्यंत जी ने ऐसे कर्मी कवियों को सावधान किया था की ==मत कहो आकाश में कुहरा घना है -यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है -एक प्रसिद्ध शायर ने भी सावधान किया था की =मुमकिन हो कल जुबानो कलम पर हों बंदिशे -आंखों को गुफ्तगू का सलीका सिखाइये

Yog se badh kar hai yogaa

योग से बढकर है योगा

योग तो पुरानी बात है अत उन्होंने योगा करने की ठानी -वैसे भी कुछ लोगों के लिए योगा लाभ की बजाय फेशन की बस्तु ज़्यादा है उनके आधे मोहल्ले और जान पहचान वालों को विदित हो चुका है की श्री मान जी योगा करते हैं फिर भी उनके बच्चों की यही इच्छा रह्ती है की दोराने योगा कोई आए उनसे पापा के वारे में पूछे और वे फक्र से बताएं की पापा इस वक्त योगा कर रहे हैं
इसके लिए उन्होंने २५ मिनट का समय चुना घर के सब सदस्यों को निर्देश था की इस अवधि में सब चुप रहें - पापाजी डिस्टर्ब न हों इसलिए बडी लडकी कमरे के किवाड़ बंद करके अंदर से सांकल चढा देती और बाहर से छोटी लडकी किवाड़ ठोकती रहती रोटी चिल्लाती रहती पत्नी झुंझलाती रहती और लड़का आवाज़ बंद करके किरकेट मैच देखता रहता - जब वे योगा करने बैठते तो घड़ी सामने रख लेते -शांती से बैठने में इन पच्चीस मिनट में वे ३५ बार आसन बदलते और ७५ मरतबा घड़ी देखले की कब पच्चीस मिनट पूरे हों और वे शबासन में लेटें
जैसे साल में दो बार नौ दिन तक पारायण करने वाले पहले से ही विश्राम पर निशान लगा देते हैं और आधे घंटे बाद ही शेष बचे प्रष्ठ गिनने लगते हैं फिर बचे हुए दोहे गिनने लगते हैं और जैसे जैसे विश्राम नजदीक आने लगता है उन्हें विश्राम मिलने लगता है -ठीक वैसे ही जैसे जैसे सुई पच्चीस मिनट की और बढ़ती इनकी प्रसन्नता बढ़ने लगती -इनके चेहरे की प्रसन्नता देख कर बच्चे समझते की पापाजी को योगा से ब्लेसनेस प्राप्त हो रही है
` शबासन उन्हें अत्यन्त प्रिय लगा जैसे अजगर से कह दिया जाए की तुम १५ मिनट चुपचाप पडे रहो या उन शंकर जी से जो "शंकर सहज सुरूप तुम्हारा -लगी समधी अखंड अपारा और =बीते संबत सहस सतासी -तजी समधी संभु अविनासी से कहा जाए तुम दस मिनट का मेडी टेशन 'क्या फर्क पढेगा वैसे ही तो वे यूँ ही दिनरात पलंग पर डले रहते है अब तो शब आसन है -पहले तो पत्नी की टोकाटाकी थी सब्जी ले आते -चक्की पर चले जाते -एकाध बाल्टी पानी भरवा देते आदि इत्त्यादी -अब तो योगा है कोई रोक टोक ही नहीं
किताबी निर्देशों के मुताबिक वे कमर सीधी करके बैठते मगर आदत के मुताबिक आधा मिनट में ही कमर झुकजाती -ध्यान के क्षेत्र में इसे सुबह लक्ष्ण माना जाता है - बशर्ते कमर ध्यान में डूबने पर झुके मगर यहाँ तो आदतन झुक रही है -शायद दुश्यन्त्जी ने ऐसे ही मोकों के लिए कहा होगा =ये जिस्म बोझ से दबकर दुहरा हुआ होगा -में सजदे में नहीं था आपको धोका हुआ होगा =
आज उनके पास योगा का सचित्र और विचित्र -प्राचीन और नवीन हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषा में बहुत सा साहित्य एकत्रित हो गया है -पतंजली जी ने जितने आसन बताए होंगे उनसे ज़्यादा ये जानने लगे हैं -योगी वशिष्ठ ने योग से जितने लाभ बताए होंगे उनसे ज़्यादा योगा से होने वाले लाभ इन्हें याद हैं
एक दिन मैंने उनसे पूछा की तुम मेरे अज़ीज़ हो -ये किताबी ज्ञान मुझे मत बतलाना -ये तो सब मैंने भी पढ़ सुन रखे हैं -तुम तो यह बतलाओ की तुम्हे हासिल क्या हुआ -क्या उपलब्धी हुई =तो उन्होंने शेर के गले में फंसी हड्डी का किस्सा सुना दिया की अगर शेर के गले में फंसी हड्डी लम्बी चोंच वाला सारस निकाल दे और शेर से पारिश्रमिक या ईनाम मांगे -तो भइया सबसे बडा ईनाम तो यही है की चोंच साबुत बाहर निकल आई इसी प्रकार सबसे बडी उपलब्धी तो यही है की वर्तमान शोर प्रदूषण के युग में हमारा परिवार आधा घंटा चुप रहकर विश्व की सेवा कर रहा है
शोर से होने वाली हानी के बारे में आम लोगों को जानकार नहीं है -जिनको जानकारी है वे खामोश है -हवाई जहाज -मोटर -ट्रक -रेल फेक्टरी आतिश्वाज़ी पठाके लाउड इस्पीकर फुल आवाज़ में अपने घर में रेडियो या टी वी चलाना इनसे दिल के रोगी को -नवजात शिशु को -अशक्त ब्रद्धों को -गर्भवती महिला को क्या क्या नुकसान होते है हम नहीं जानते =रेलवे लाइन के निकट वाशिंदों को क्या क्या रोग घेर लेते है यह भी हमको पता नहीं है =दीवाली पर पठाके चलाने वाबत सुप्रीम कोर्ट ने क्या निर्देश दिए थे हमने उन्हें कितना माना =बोलने से कितना नुकसान होता है हमें पता नहीं =गंभीर रोगी को डाक्टर बोलने से क्यों मना करता है सोचा नहीं
उनकी बात मुझे सटीक लगी काश हम भी थोड़ा थोड़ा चुप रहकर वातावरण में फैल रहे शोर प्रदूषण को कम करने में सहायक बनें

Sunday, July 13, 2008

दुखडा कासे कहूं

स्कूल और कालेज शासकीय काम काज की तरह धीरे धीरे खुलने लगे -बच्चे कामकाजी महिलाओं की तरह व्यस्त होने लगे -घरों में योगी के मन की तरह शान्ति और विद्यालयों में संसद की तरह अशांति का वातावरण निर्मित होने लगा - माँ-बाप को ऑडियो और बीडियो केसेट के शोरगुल से रहत मिली - जगह जगह कामिक्स किराये पर देने वाले अन्य व्यवसाय की तलाश करने लगे और विद्यार्थी रूपी पुत्र -पुत्री के स्कूल कालेज चले जाने और कर्मचारी रूपी पति के ऑफिस चले जाने से पत्नियाँ अकेले बोर होने लगी =उन्होंने पडोसिन को आवाज़ दी बहन क्या कर रही हो -झाडू लगा रहीं हूँ -यहीं आकर लगालो न में अकेले बोर हो रही हूँ =
कुछ पिता गण अपने पुत्र के भविष्य के साथ अपने भविष्य के प्रति चिंतित होने लगे =भविष्य के प्रति चिंतित होना मानव स्वभाव है और कुछ दुकाने हजारों सालों से आदमी की इसी मनोवृत्ति के कारण चल रही हैं =हर व्यक्ति अपना भविष्य जानना चाहता है =हाथ दिखता है जन्म कुंडली दिखता हैवे कह रहे थे ==अपने हाथों की लकीरें तो दिखादूं लेकिन -क्या पढेगा कोई किस्मत में लिखा ही क्या है == खैर -एक नव विवाहित जोड़ा एक ज्योतिषी के पास पहुंचा =ज्योतिषी ने पत्नी से पूछा क्या आप अपने पति का भविष्य जानना चाहती हैं - वह बोली आप तो इनका अतीत बतला दीजिये इनका भविष्य तो अब मेरे हाथ में है
ग्रामीण अंचलों के गुरुकुल रूपी विद्यालयों के मास्साब एक दूसरे से संपर्क करने लगे क्योंकि दोनों को मिल कर एक एक हफ्ता ड्यूटी देना है और ६-६ दिन के आकस्मिक अवकाश की दरखास्तें एक दूसरे को प्रदान करना है =शासकीय नियम के वावजूद वहाँ केजुअल लीव का रजिस्टर मेंटेन नहीं होता है क्यों किकोई केजुअल लीव का लाभ उठता ही नहीं है
रेगिंग प्रथा से जूझने के लिए विद्यार्थी किसी टायसन जैसे गुरु से शिक्षा लेने को बैचेन हैं और डोनेशन प्रथा से जूझने के लिए पिता श्री किसी मेहता जैसे गुरु से शिक्षा लेने दो वेताब है =वैसे वर्तमान छोटे छोटे स्कूलों की फीस वही से मिलने वाली किताबें और कॉपियाँ और ड्रेस वस्ते की कीमत किसी बड़े स्कूल के डोनेशन से कम नहीं बैठती
मैं अपना दुःख किसी से नहीं कहता -मगर सोचता हूँ की इस रेगिंग प्रथा को इस देश में प्रचलित करने वालों ने खेवर और बोलन के दर्रे से प्रवेश किया अथवा वे जल या वायु मार्ग से आए =क्यों कि इस प्रथा को चालू करने में विदेशी ताकतों के हाथ होने की संभावनाएं इसलिए भी बलवती हैं क्योंकि इतिहासवेत्ता बतलाते हैं कि सिन्धुकालीन सभ्यता में कोई चिन्ह उन्हें इस प्रथा के नहीं मिले और पुरातत्ववेत्ता बतलाते हैं कि मोहन जोद्रो और हरप्पा की खुदाई में उन्हें इस प्रथा के कोई अवशेष नहीं मिले =प्राचीन ग्रंथों के अनुसार गुरुकुलों में भी यह प्रथा नहीं थी
प्रथाये दो तरह की होती हैं अच्छी व् बुरी -यदि यह प्रथा अच्छी है तो इसका व्यापक प्रचार व् प्रसार होना चाहिए -प्राईमरी स्कूलों में भी यह प्रथा डाली जाना चाहिए -शासकीय और अर्धशासकीय कार्यालयों में भी इसे लागो करना चाहिए दूर दर्शन और समाचार पत्रों में शाश्कीय विज्ञापन देने चाहिए =और यदि प्रथा बुरी है और इसकी वजह से किसी जूनियर की जान भी जा सकती है और शिक्षा जगत पर लगा हुआ यह एक धव्वा है तो शिक्षित बनने -बच्चियों को शिक्षित बनने कि प्रेरणा वाले विज्ञापन टीबी पर बतलाने चाहिए क्योंकि विधार्थी और बच्चे टीबी से बहुत ज़ल्दी सीखते है =वे सीख जाते हैं कि कैसे कक्षाओं की कार्यवाही नहीं चलने देंगे -सब एक साथ बोलेंगे -कोई किसी कि नहीं सुनेगा -शिक्षक के बार बार अनुरोध करने पर भी शांती से अपनी शीट पर नहीं बैठेंगे -शिक्षक का घेराव करेंगे आदि इत्यादि -यह सब वे लाइव टेलीकास्ट से मार्गदर्शन प्राप्त कर रहें हैं
डोनेशन वाला दुःख भी में किसी से नहीं कहना चाहता -क्योंकि यह एक अंग्रेज़ी शब्द है और अंग्रेजी शब्द की बुराई करने पर सारे विश्व के अंग्रेज़ी प्रेमियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है - इसका हिन्दी शाब्दिक अर्थ है अनुदान =दान की बुराई और इस देश में -गज़ब हो जाएगा-यहाँ गाय का दान इसलिए होता क्योंकि उसकी पुँछ पकड़ क्र बैतरनी पार की जाती है =गाय न हो तो गाय के पैसे भी दान में गाय के नाम पर दिए जा सकते हैं मज़ा देखिये ११ रुपे में भी गाय आ सकती है =सब दानों में श्रेष्ठ विद्यादान है और विद्यादान का स्थल शाला है और शाला का विकास आवश्यक है तो शाला के विकास के लिए अनुदान आवश्यक है = जब शिक्षकों का विकास होगा तो विद्यार्थियों का विकास होगा और विद्यार्थी देश का भविष्य हैं तो देश का विकास भी होगा -गोया शाला विकास के लिए दिया जाने वाला डोनेशन देश के विकास के लिए सहायक है
दूसरी बात यह भी है की डोनेशन से पुत्र का विकास भी होता है =दान की हुई राशिः कई गुना होकर वापस मिलती है -जब दान के रूप में पुत्र का विकास होगा तो दान की हुई राशी कई गुना होकर दहेज़ के रूप में वापस मिलेगी
सार बात यह है की आपको किसी घोटाले में ही क्यों न शामिल होना पड़े पुत्र के भविष्य के लिए डोनेशन और पुत्री के भविष्य के लिए दहेज़ की जुगाड़ तो जमाना ही होगी जुगत तो लगानी ही होगी

Saturday, May 10, 2008

rahiye ab aisee jagah chal kar

रहिये अब ऐसी जगह चलकर

रहिये अब ऐसी जगह चल कर जहाँ मच्छर न हों -पत्नी का यह शायराना अंदाज़ भलेही मुझे अच्छा लगा किंतु मेरा कहना यह था की जायें तो जायें कहाँ - उनका कहना यह था की अपने यहाँ जैसे और जितने मच्छर कहीं भी नहीं होंगे इसलिए मकान या मोहल्ला बदलना ही होगा -मेरा सोच यह है की शेर -सांप -बिच्छू -मच्छर से डर कर नहीं वल्कि इंसान -इंसान से डर कर मोहल्लों का परित्याग किया करते हैं
उनकी परेशानी अस्वाभाविक नही थी -औसत मच्छर से बडे और मक्खी के आकार से कुछ छोटे आम मच्छर से हट कर यानी ख़ास मच्छर गोया बहुत ही खतरनाक मच्छर -अगरबत्ती व टीकियों की खुशबू व बदबू को नज़रंदाज़ कर देते है -प्याज काट कर बल्ब के पास लटका दो तो उसके इर्दगिर्द ऐसे मंडराने लगते हैं जैसे प्याज प्याज न होकर कोई फूल हो और वे स्वयम भँवरे हों - घर में धुआं कर दो तो वे यथास्थित रहे और आदमी घर से भागने लगे -किसी की आँख में जलन -किसी को आंसू -किसी को छींक -किसी को खांसी =मेरे द्वारा एक दिन धुआं कर देने पर मेरे बीबी बच्चों का मुझ पर नाराज़ हो जाना तो स्वाभाविक था किंतु आश्चर्य बिल्डिंग के अन्य लोग भी नाराज़ नजर आए -दीवालें काली हो रही हैं -कमरों में बैठना मुश्किल है -अजीब किरायेदार आया है -धुआं कितना घातक होता है जानता ही नहीं है -आक्सीजन की कमी हो गयी आदि
मच्छरदानी कोई अज़नवी चीज़ नहीं मगर दुर्घटना और दुर्भाग्य क्या है इस बाबद मेरे मानना है की मच्छरदानी खरीदना दुर्घटना और उसे बांधना दुर्भाग्य है -खरीद तो ली मगर इसे बंधोगे कहाँ -अव्वल तो मकान मालिक दीबारों में कील ठोकने नहीं देगा -दोयम कीलें स्वयम नहीं ठुकेंगी थोडा सा पलस्तर उखाड़ कर टेडी हो जायेगी और उचट कर ऐसी जगह गिरेंगी की ढूंढते रह जाओगे - और ठोकने वाले का अंगूठा मरहम पटटी का इंतजाम पहले कर लेना चाहिए -वैसे कायदा तो यह है की कील ठोको तो कील पत्नी को पकडाओ
मच्छरदानी बाँध कर सर्ब प्रथम उसके अंदर उपस्थित मच्छरों की समुचित व्यवस्था करने में सब बुद्धिमता विसर्जित हो जाती है -ऐसा मालूम पड़ता है जैसे मच्छर दानी में कोई ताली बजा बजा कर कीर्तन कर रहा हो -इधर ज़ोर की ताली से अपने हाथ लाल और और मच्छर गायब -वह ऊपर मछर दानी के कोने में -और कोने वाले को मारने की कोशिश की तो मच्छर दानी की डोरी टूटी या कील उखडी
चारों तरफ मच्छर दानी गद्दे के नीचे दबाने के बाद समस्या यह की लाईट आफ कैसे करें -लाईट बंद करने गए यानी दो बार मच्छर दानी हटाई और इधर द्रुत वेग से उनकी प्रविष्ठी हुई -फिर रात भर गाते रहिये "जानू जानू री छुपके कौन आया तेरे अंगना " जाली में फंसा वह प्राणी कितना दुर्दांत -खूंखार और आक्रामक हो जाता है -भुक्तभोगी ही जनता है
पत्नी का यह सचोट अनुज्जवल पक्ष है की "नाली बनाने वाले जाने चले जाते हैं कहाँ " और यह भी की " नाली बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई -काहे को नाली बनाई ""और अगर बनवाई तो इसे ढकवाते क्यों नहीं - मने समझाना चाहता हूँ "तुम सुनहु ग्रह मंत्री स्वरूपा नाली बनही बजट अनुरूपा "" और बजट आजायेगा तो ढकवा देंगे
तो चलो 'फिर दूसरी जगह चलो -अरे वाह कल को तुम कहोगी की ऐसी जगह चलो जहाँ हत्या बलात्कार चोरी डकेती अपहरण न होते हों दूसरे नालियों में कचरा सब्जी छिलके तुम डालो ऊपर से शिकायत ==इस आग को कैसे कहें ये घर है हमारा -जिस आग को हम सब ने मिलकर हवा दी है