Sunday, April 13, 2008

बधू माला क्यों नहीं
अपनी आर्थिक स्थिति से अधिक खर्च करके बनवाये गए विशाल मंच पर दो सिंहासन नुमा कुर्सियों के सामने सजा दूल्हा और ब्यूटी पार्लर से सुसज्जित करा कर लाई गई दुल्हन अत्यन्त सुंदर बडे बडे हार लिए खड़े हैं =बर अपने निजी और ख़ास मित्रों की सलाह पर हार डलवाने हेतु झुकने को तैयार नहीं =दोस्त कहते है बेटा आज झुक गया तो जिंदगी भर झुकना पडेगा = भला पत्नी के सामने कौन जिन्दगी भर झुका रहना चाहेगा =तो वह और भी तन कर खडा हो जाता है - बधू की परेशानी स्वभाबिक है =मालायें ड्लती हैं तालियाँ बजती हैं कैमरा मेन ठीक वक्त पर तस्वीर नहीं ले पाता =कैमरा मैन के यह बतलाने पर की वह चित्र नहीं ले पाया है पुन मालायें उतारी जाती हैं पहनाई जाती हैं कैमरा का फ्लश चमकता है -अबकी बार तालियाँ नहीं बजती हैं =
कैमरा मैन की खातिर हार उतार कर दोबारा डाले जाने पर मुझे एक नाटक का वह द्रश्य याद आजाता है जिसमें नायिका को खलनायक गोली मारता है एन मौके पर हीरोइन को बचाने उसके सामने सह अभिनेत्री आजाती है पर्दे के पीछे से पठाका चलता है -यानी गोली सह अभिनेत्री को लग जाती है = वह गिर कर मर जाती है या मर कर गिर जाती है जो भी हो वह गिर जाती है तालियाँ बजाते दर्शकों में से किसी ने शरारत करते हुए ख दिया =वंसमोर=सह अभिनेत्री तत्काल उठ कर हीरोइन के सामने खडी हो गई =
दूल्हा दुल्हन कुर्सियों पर बैठ जाते हैं एक महिला आकर कहती है गलत बैठ गए लडकी को बायीं और बिठाओ -पोजीशन बदल जाती है =लडकी का चाचा आजाता है कहता है ठीक बैठे थे बायीं तरफ लडकी फेरों के बाद बैठती है - कुर्सियों पर दूल्हा दुल्हन फिर बदल जाती हैं - मैं अपने आप से कहता हूँ ठीक है कैसे भी बैठ जाओ क्या फर्क पड़ता है क्यों फिजूल में नाटक कर रहे हो =
मंच पर वर माला का कार्यक्रम समाप्त हो गया में जिज्ञासा प्रकट करता हूँ इस कार्यक्रम का नाम वरमाला क्यों है बधू माला क्यों नहीं है दोनों ही तो एक दूसरे को माला पहनाते हैं तो वरमाला ही क्यों दहते कहते हैं हमारे जमाने में तो यह कार्यक्रम नहीं होता था - पास की कुर्सी पर एक ब्रद्ध सज्जन पान की जुगाली करते हुए बोले =अजी जनाब यह दस्तूर बहुत पुराना है राजा रामचंद्र के जमाने से वरमाला का कार्यक्रम होता चला आरहा है सीता जी ने राम को वरमाला डाली थी =हमने कहा श्रीमान वह वरमाला नही थी वो तो जय माला थी = इस माला का पाँच वार जिक्र आया है और कहीं भी बाबाजी ने वरमाला शब्द का प्रयोग नहीं किया है सुनिए ==कर सरोज जैमाल सुहाई =फिर =पहिरावाहू जयमाल सुहाई == और ==सिय जयमाल राम उर मेली = तथा रघुवर उर जयमाल =तथा ससिहि सभीत देत जयमाला = बताइये इसमें वरमाला शब्द कहाँ है =
वे पान चवाने में मशगूल थे में चालू रहता हूँ =राम ने तो वीरता का काम किया था =बल शोर्य और पराक्रम की पूजा होती आयी है जयमाला ऐसे ही लोगों के हिस्से में आती है विवेकानंद कहते थे जिस युवक में लडकी को गोद में उठा कर एक मील दौड़ लगाने की क्षमता हो उसी को शादी करना चाहिए =इन दूल्हा दुल्हन को देखो -कपडों से पहिचाने जा रहे हैं =एक से कपडे पहिना दिए जायें तो पता ही न चले की कौन दूल्हा कौन दुल्हन =और यह लड़का जरा हालत देखो इसकी शादी के तीन साल बाद खिलौना फ़िल्म का गाना गायेगा =की में चल भी नहीं सकता हूँ और तुम दोडे जाते हो = और यह लडकी हाँ याद आया बी ऐ फईनल में एक लडकी फर्स्ट क्लास आई तो कालेज ने पेरेंट्स को बुलाया पिताजी बाहर गए थे तो माँ को कालेज अकेले लडकी के साथ जाना पडा कालेज स्टाफ ने देखा तो माँ से कहा आप दोनों माँ बेटी जैसी लगती ही नहीं है माँ को अपने रख रखाव पर गर्व होना स्वाभाबिक था शर्मा कर बोली क्या में बेटी के बराबर दिखती हूँ स्टाफ ने कहा नहीं आपकी बेटी आपके बराबर दिखती है –
यह कुछ नहीं है एग जो स्लिम दिखने का फैशन चला है यह फैशन नहीं है खुराफात की जड़ है =ठीक है ज़्यादा वजन होना या बढ़ना अच्छी बात नहीं है लेकिन वजन और तंदुरुस्ती में अंतर होता है एक बाल्टी पानी लेकर दूसरी मंजिल पर जाना पडे तो साँस फूल जाए जियरा धक् धक् करने लगे =कहन लगे साब हम जिन्दगी का बोझ उठाएंगे = जो ख़ुद बैसाखी के सहारे चलता हो वह दूसरों को क्या सहारा देगा =और आजकल जो ये घटनाएं हो रही है =हाथ पैरों में इतना दम हो की लडके का हाथ पकडले तो छुडाने के लिए तड़पता रहे ==जब से लैला ने धुन्यो मजनू चलती राह -गाय मरकही जान के कोऊ न छेड़े ताहि =
वे शायद बोर हो रहे थे सो लिफाफा निकाल दूल्हा दुल्हन को आशीर्वाद देने बड़गए में भी लिफाफा टटोलने लगा जिसमें बड़े अहत्यात से एक सो एक रुपे रखे थे बार बार दिमाग में यही विचार आ रहा था की इनसे पांच छे किलो गेहूं आजाता तो आठ दस दिन निकल जाते =पंडितों को पन्द्रह तारीख के बाद व्याह की लग्न निकालना ही नहीं चाहिए =क्या ही अच्छा होता की चार माह तक लगातार सोने की वजाय देव हर माह की पन्द्रह से तीस तारीख तक सोते तो उन्हें भी दो माह का अतिरिक्त विश्राम मिल जाता और हमें लिफाफा रूपी आशीर्वाद देने के लिए अपने मित्रों से आजीवन रिनी रहने के लिए कर्ज़ न लेना पड़ता =यह नितांत सत्य है की पहली तारीख को शादी होगी तो दूल्हा दुल्हन को अधिक आशीर्वाद मिलेगा =
जैसे देव याचक अग्नि की -योगी एकांत की -रोगी चिकित्सक की -जमाखोर भाव ब्रद्धि की -भयभीत रक्षक की खोज में निरंतर रहता है उसी प्रकार सयानी लडकी का बाप वर की तलाश में निरंतर रहता है =वर यानी दूल्हा उस शादी वाले दिन राजा होता है तभी उसे दूल्हा राजा कहा जाता है =मेरा मानना है की बरात निकल रही हो और आप सायकल या मोटर सायकल पर हों तो उतरकर उसके सम्मान में खडे हो जाइए तो दूल्हा राजा होता है = पुराने जमाने में राजा दूसरे कमजोर राज्य पर आक्रमण करता था और राजकुमारी से विवाह करता था आज भी दूल्हा राजा है आक्रामक है बाराती उसके सैनिक है सब वोही रस्मो रिवाज़ वह हथियार रखता है कटार के रूप में -तोरन मारता है -आक्रमण और लूट का सीधा सम्बन्ध है वह दहेज़ लूटता है -लडकी का बाप दुर्वल राज्य का प्रतीक है -पहले रणभेरी तुरही शंख बजते थे आज डिस्को बजता है -पहले युद्ध जीतने के पश्तात सेनिक जश्न मनाते थे आज बाराती नाचते गाते पहले जश्न मनाते है क्योंकि यह तो तय है की युद्ध जीत लिया गया है लडकी के बाप ने पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया है अपनी पगड़ी लडके के बाप के चरणों में रख दी है
जबतक पुरानी प्रथाएं रूप बदल बदल कर कायम रहेंगी बधू कितनी ही पढ़ लिख जाय आत्म निर्भर हो जाय -शराबी पती से शादी नकार दे -बरात लोटादे मगर वर माला वर माला ही कहलायेगी शायद वह बधू माला कभी नहीं कहला पाएगी

2 comments:

दीपक भारतदीप said...

मेरा अनुमान गलत नहीं था की आप कोई गजब के लेखक और साथ में ब्लोग लेखक भीं हैं. अब आप यह बताएं की आपके यह ब्लोग नारद और ब्लोग्वानी पर दिखते हैं या नहीं. नहीं टू करा लीजिये. और लोग भी इसे पढ़ सकेंगे.आपका ब्लोग हिन्दी पत्रिका पर आज लिंक कर दूंगा और बाकी भी जगह रखता जाऊंगा. मुझे आपके आलेख पसंद आये.
दीपक भारतदीप

दीपक भारतदीप said...

श्रीवास्तव जी
आपका ब्लोग मैंने अपने वर्डप्रेस के तीन ब्लोग पर लिंक कर दिया है. आप मेरे ब्लोग दीपक भारतदीप का चिंतन या अनंत शब्द योग पर जाकर ब्लोग वाणी और चिटठा जगत के लोगो क्लिक कर वहाँ से उनकी ईमेल निकालें और वहाँ अपने ब्लोग का पता भेजकर उसे पंजीकृत कराएँ. दरअसल यह बात में हँसते हुए लिख रहा हूँ कि आप जानबूझकर या अनजाने में मुझे चौंका देते हैं. मस्तराम दीपक भारतदीप का चिंतन का हिन्दी ब्लोग मैंने प्रयोग के लिए बनाया है. इसे चिट्ठाजगत, नारद और हिन्दी ब्लोग ने मेरे से पूछे बिना दिखाना शुरू किया है. इस पर मैं अपने अन्य अपंजीकृत ब्लोग की रचनाएं रखता हूँ. आपना इस पर कमेन्ट रखकर मुझे हैरान कर दिया और तब लगता है कि आप ब्लोग के बारे में मुझसे भी अधिक जानते हैं. खैर आप इनको फोरमों पर पंजीकृत कराएँ तो आपको बहुत मित्र मिलेंगे. मैं तो हूँ ही. किसी दिन गुना में मिलूंगा. हाँ कल मैं आपको ईमेल भेज रहा था पर वापस आ जाता था. मैं चाहता हूँ कि आपके आलेख और भी लोग पढें. अगर आपको कोई दिक्कत हो तो मैं इन फोरमों पर ईमेल कर दूंगा. हम दोनों एक क्षेत्र हैं के हैं और हवा पानी की वजह का कुछ गुण तो समान होंगे ही. जैसे मुझे लिखता देख दुसरे चौंक जाते हैं आप मुझे चौंका देते हैं. और हाँ अपने ब्लोग की सैटिंग में जाकर word verficatiaon को बंद कर दें यह बहुत परेशान करता है.
दीपक भारतदीप