Sunday, September 21, 2008

व्यंग्य हमारी समझ न आवे

आज से लगभग पचास साल पूर्व जब मैंने कोर्स की पुस्तकों के अतिरिक्त कुछ पढ़ना शुरू किया था तब मेरी समझ में यह नहीं आता था की व्यंग्य क्या है और व्यंग्य कार कौन है ,यह बात आज भी मेरी समझ में नहीं आती है , इतना जरूर समझ में आता है मैंने व्यंग्य पढ़े नहीं , व्यंग्य समझता नहीं और व्यंग्य लिखने की कोशिश करता हूँ यही व्यंग्य है /
लेख में व्यक्तिगत आक्षेप ,द्विअर्थी बात या चुटकुले लेख को व्यंग्य बना देते हैं /चुटकुले और व्यंग्य का अन्तर भी मैं नही समझ पाता, क्या जिस चुटकुले को सुनकर हंसी आजाये वह चुटकुला और जिसे सुन कर हंसी न आए वह व्यंग्य / किसी किसी को चुटकुले देर में समझ में आते है तो क्या जब तक समझ में न आवे तब तक व्यंग्य और समझ में आते ही चुटकुला हो जाता है /
चेनल की बातें हास्य हैं ,व्यंग्य है , हकीकत है , फ़साना है क्या है मसलन ''''कहीं भी मत जाइयेगा , दिल थाम कर बैठिएगा ,आपके दिल दहल जायेंगे, आप देखेंगे एक ऐसी कातिल पिस्टल जो आपने अभी तक नहीं देखी होगी -केवल हम ही पहली बार आपको दिखा रहे हैं -और आप भी पहली बार इसे देखेंगे ,एक ऐसी पिस्तोल जो देखने में तो आम पिस्तोल जैसी है मगर है बहुत मारक, घातक एक ऐसी पिस्तोल जिससे ऐसी गोली निकलती है जो न डाकू को पहिचान्ती है न संत को , बालक को पहिचानती है न ब्रद्ध को, न दोस्त को पहचानती है न दुश्मन को, ऐसी गोली निकलने वाली पिस्तोल आप देखेंगे थोड़े अन्तराल के बाद, कहीं भी मत जाइएगा ,बाथरूम भी नहीं "" और आधा घंटा बाद , डकेती की योजना बनते व्यक्ति से पुलिस द्वारा जप्त पिस्तोल दिखा देंगे, वह भी लाल गोल घेरे में /
"" आप देखेंगे मोबाईल में यमराज ,नाग का पुनर्जन्म , दुनिया नष्ट हो जायेगी ,सब कुछ मिट जाएगा केवल हम बचे रहेंगे आपको बताने के लिए की दुनिया नष्ट हो चुकी है और सब कुछ मिट चुका है ""
वर्तमान समय में में आदमी इतना निराश्रित हो चुका है या यह कहें कि सरकार प्रशासन पर इतना आश्रित हो चुका है कि कुछ मत पूछो ,मिलजुल कर एक दूसरे की मदद करने की वजाय मिलजुल कर सरकार को कोसेंगे / कहीं बरसात में या केले के छिलके से फिसल कर कोई गिर पड़े , तो, वह इस उम्मीद में पड़ा रहेगा कि सरकार उठाने आए / और चेनल "" एक व्यक्ति यहाँ फिसला पड़ा और प्रशासन सोया हुआ है ' पुलिस भी अभी तक मौके पर नहीं आई है ,भीड़ बड़ती चली जारही है और आप देख रहे है लाइव टेलीकास्ट / ग्रतक ( गिरे हुए ) से हमारा संबाददाता बात कर रहा है ग्रतक का कहना है कि मंत्री जी ख़ुद आकर उठाएंगे तो उठूंगा मगर मंत्री जी है कि उन्हें सुरक्षा व्यबस्था की मीटिंग से ही फुर्सत नहीं मिल पारही है, इन्हे इस ग्रतक की बिल्कुल परवाह नहीं है / राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्रकोष्ठ से भी अभी तक कोई नहीं आया है /जिलाधीश चुनाव की तैयारी और सेना बाढ़ पीडितों की मदद करने में ही लगी हुई है , ग्रतक पर कोई भी बड़ी विपत्ति आ सकती है कोई इसकी चेन छीन सकता है कोई ट्रक इसे कुचल सकता है /
आप देख रहे है लाईव टेलीकास्ट भीड़ बड़ चुकी है बच्चे तालिया बजा रहे हैं ,महिलायें मुह छुपा कर हंस रही है मगर प्रशासन सोया हुआ है न अभी तक केले के छिलके फैकने वाले को पुलिस पकड़ पाई है न ही केले बेचने वाले को ,सुना है स्केच बनवाया जा रहा है / अब हम भीड़ में खड़े लोगों से पूछते हैं कि उनके क्या विचार है , हाँ आपका नाम .....क्या करना चाहिए "" क्या करना चाहिए इसे उठ कर घर चले जाना चाहिए "" अच्छा अब दूसरे से पूछते हैं ,आपकी राय में क्या करना चाहिए "" देखिये कलेक्टर को आकर इसे मुआवजा देना चाहिए , पुलिस द्वारा छिलके वाले को गिरफ्तार करना चाहिए और किसी मिनिस्टर को आकर इसे उठाना चाहिए
देखिये पचास प्रतिशत लोगों की राय ये है ..... और पचास प्रतिशत के राय ...... है , आप भी अपनी राय हमें एस एम् एस कर सकने हैं "" पुराना साहित्य क्या व्यंग्य था या हकीकत थी मसलन रीति काल - भवरे कमल समझ कर चेहरे पर मंडराया करते थे , अब या तो मुख कमल थे या भवरे वेबकूफ थे / राज कुमार नगर से जारहे हैं ऊपर झरोके में बैठी हुई को देखते हैं और बेहोश होकर गिर पड़ते हैं / आज के आयटम सोंग युग में वे होते तो तो न जाने कितनी बार मरते " सौ बार जनम लेंगे ,सौ बार फ़ना होंगे ऐ जाने वफ़ा फ़िर भी हम आयटम सोंग देखेंगे "
व्यंग्य मेरी समझ में बिल्कुल ही न आते हों ऐसी बात भी नहीं है / मैं मुंशी प्रेमचंद जी की कहानी पढ़ रहा था उसमें एक जगह महात्मा के वारे में पढ़ा "" तेजस्वी मूर्ती थी पीताम्बर गले में , जटा सर पर , पीतल का कमंडल हाथ में ,खडाऊ पैर में ,ऐनक आंखों पर , सम्पूर्ण वेष उन महात्माओं का सा था जो रईसों के प्रासादों में तपस्या , हवा गाड़ियों में देव स्थानों की परिक्रमा और योग सिद्धि प्राप्त करने के लिए रूचिकर भोजन करते हैं ""
यह भी मेरी समझ में आया कि सीता हरण में कंचन म्रग एक कारण था और जब सीता को खोजते राम बन में जाते है और उनसे डर कर हिरन भागने लगते है तो हिरनियाँ हिरनों से कहती है ""तुम आनंद करहु म्रग जाए , कंचन म्रग खोजन ये आए ""
मैं तो केवल यह नहीं समझ पाता हूँ कि पूरी रचना या लेख में केवल एक लाइन का व्यंग्य पूरी रचना को व्यंग्य बना देता है या कि जो लेखक व्यंग्य लेखक के रूप में ख्याति अर्जित कर चुका है उसकी कही गई या लिखी गई हर बात व्यंग्य हो जाती है कुछ लोंगों का विचार है कि राजनीति और राजनेताओं के वगैर व्यंग्य लिखा ही नहीं जासकता इन्हे केन्द्र में रखना ही पड़ता है, तो फ़िर टीका टिप्पणी ,आलोचना ,आक्षेप , उन्हें हास्य का केन्द्र विन्दु बनाना क्या व्यंग्य हो जाता है /
व्यंग्य हमेशा से लिखा जाता रहा है और लिखा जाता रहेगा दुनिया बनी यानी सेवफल खाने इत्यादि से लेकर लाल गेहूं खाने तक , बस इतना चाहता हूँ के मेरी समझ में आता रहे / या तो व्यंग्य इतना बड़ा होता है कि मेरे छोटे दिमाग में घुसता नहीं है या फ़िर दिमाग इतना बड़ा और खोखला है कि "" वदन पैठ पुनि बाहेर आवा, माँगा विदा ताहि सर नावा ""/ व्यंग्य हो तो ऐसा हो जैसे हम बचपन में आतिशीशीशा लेकर सूर्य की किरणों से अपने या अपने मित्र के शरीर पर जलन पैदा किया करते थे /

11 comments:

Udan Tashtari said...

क्या जब तक समझ में न आवे तब तक व्यंग्य और समझ में आते ही चुटकुला हो जाता है - ये भी एक व्यंग्य ही है. :)

शोभा said...

बहुत सुन्दर और विस्तृत व्याख्या की है आपने व्यंग्य की। पढ़कर अच्छा लगा। एक विचारप्रधान लेख के लिए बधाई स्वीकारें।

seema gupta said...

" thanks a lot for your presence on my blog, read your artical, mind blowing,"

well na to picture pehle se select kee hain na hee poem, bus jo dil mey aaya likh liya or baad mey pictures select kr liya jo words ke according shee lgeen. Once again thanks for your word of appreciation.

Regards

Ravi Srivastava said...

आज मुझे आप का ब्लॉग देखने का सुअवसर मिला।
वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है।
‘…हम चुप है किसी की खुशी के लिये
और वो सोचते है के दिल हमारा दुखता नही’’
आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी और हमें अच्छी -अच्छी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगे
बधाई स्वीकारें।
आप मेरे ब्लॉग पर आए, शुक्रिया.
मुझे आप के अमूल्य सुझावों की ज़रूरत पड़ती रहेगी.

...रवि
www.meripatrika.co.cc/
http://mere-khwabon-me.blogspot.com/

Gyandutt Pandey said...

श्रीवास्तव जी, आप ६६ वर्ष की वानप्रस्थीय अवस्था में ब्लॉग-प्रस्थीय हैं! इतनी उम्र, ऊर्जा और इतना सशक्त लेखन - मैं तो बहुत प्रभावित हुआ।
आपकी उपस्थिति से हिन्दी ब्लॉग जगत तो वास्तव में एन-रिच हुआ है।

---
(क्या आप वर्ड-वेरीफिकेशन हटा सकते हैं?)

Shastri said...

"व्यंग्य हमेशा से लिखा जाता रहा है और लिखा जाता रहेगा दुनिया बनी यानी सेवफल खाने इत्यादि से लेकर लाल गेहूं खाने तक , बस इतना चाहता हूँ के मेरी समझ में आता रहे"

चिट्ठाकारी करते रहें, सब समझ में आने लगेगा!!

Shastri said...

एक अनुरोध -- कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन का झंझट हटा दें. इससे आप जितना सोचते हैं उतना फायदा नहीं होता है, बल्कि समर्पित पाठकों/टिप्पणीकारों को अनावश्यक परेशानी होती है. हिन्दी के वरिष्ठ चिट्ठाकारों में कोई भी वर्ड वेरिफिकेशन का प्रयोग नहीं करता है, जो इस बात का सूचक है कि यह एक जरूरी बात नहीं है.

वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिये निम्न कार्य करें: ब्लागस्पाट के अंदर जाकर --

Dahboard --> Setting --> Comments -->Show word verification for comments?

Select "No" and save!!

बस हो गया काम !!

Shastri said...

हर पेराग्राफ के बाद एक लाईन खाली डालें, पठनीयता बहुत बढ जायगी

swati said...

क्या जब तक समझ में न आवे तब तक व्यंग्य और समझ में आते ही चुटकुला हो जाता है ......mujhe bahut hi achha laga aalekh

प्रदीप मानोरिया said...

आपने मेरे ब्लॉग पर पधार कर अनेक कविताओं को पढा और उन्हें सराहा एतदर्थ धन्यबाद ... आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं | आपका थोड़ा परिचय प्राप्त हो सके तो आभारी रहूँगा // मेरे ब्लॉग पर आपको पुन: पधारने का आमंत्रण है

anitakumar said...

श्रीवास्तव जी बहुत ही बड़िया लिखा है। मैं आभारी हूँ कि आप ने मेरा ध्यान अपने ब्लोग की तरफ़ खींचा, नहीं तो मैं इतना अच्छा पढ़ने से वंचित रह जाती